Friday, October 22, 2010

मेरा "मैं" !

"  यूँही सोचा मैंने, चलो खुद से मिल कर आते हैं,
"खुद से मिल कर आते हैं???"
सोचा मैंने आखिर कैसे?
कहाँ खोजूं खुद को?
कहाँ मिलेगा मुझे मेरा "मैं",
दुन्ड़ता रहा हर राह, हर डगर,
एक बार फिर सोचा मैंने आखिर कहाँ हूँ मैं?
क्यूँ  हूँ मैं?
एक दिन उस ऊपर वाले से भी पुछा,
जवाब मिला; वो भी एक सवाल ही था,
कहा बस चला जा जहाँ समय ले जाये,
सुनना अपने मन की मिल आयेगा तुझे तेरा मैं,
इसी आस में चलता चला मैं,
शायद भटक गया...
न मिला मैं, न मिला कोई,
जो था साथ वो भी खो गया,
पता नहीं कैसे, एक दिन आईना उठाया मैंने,
देखा; सोचा; ये तो मैं हूँ,
अफ़सोस अज वो आइना भी टूट गया,
जिसने मुझे मुझसे मिलाया वो भी चला गया,
अब कहाँ जाऊं मैं, डरता हूँ फिर भटक न जाऊं मैं,
नहीं चाहता खोना इस भीड़ में,
क्यूंकि शायद कहीं किसी कोने में
अब भी कोई सोचता है,
बस एक बार और,
नहीं खोऊंगा खुद को, ये वादा है मेरा मेरे "मैं" से!!"